रोज़ लिखा करो

रोज़ लिखा करो

चाहे अच्छा चाहे बुरा 

पर रोज़ लिखा करो

चाहे मोहब्बत की हो या चाहे नफ़रत

पर रोज़ लिखा करो

चाहे सरकार के वफादार हो चाहे विरोधियों के सिपहसलार 

पर रोज़ लिखा करो

चाहे तुम्हें अपने शहर की खूबसूरती भायी हो

चाहे वो गाँव का अपनापन कहीं खल रहा हो

पर रोज़ लिखा करो

क्योंकि लिखना कई दफ़ा कई  मर्ज कम कर देता है 

कई ज़ख्म दे देता है

 तो कई भर भी देता है

इसीलिये कहता हूँ कि रोज़ लिखा करो।

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चेहरा

एक चेहरा वो, जो तुम सबको दिखाती हो,

एक चेहरा वो जो तुम सबसे छुपाती हो

एक चेहरा वो जिससे तुम मुस्कुरा देती हो

या एक चेहरा वो जिसमें तुम सारा दर्द समाती हो

एक चेहरा वो जिससे मेरा बरसों का राब्ता है

या एक चेहरा ये जिससे मैं आज वाकिफ हुआ हूँ 

मैं किसे सच मानूँ?

उसे जिसे मैं सालों से जानता था,

या उसे जो पर्दा उठने के बाद आज दिखा है…

या चेहरा पढ़ने की बात को मैं पीछे ही रख दूँ

कौन जाने , इस चेहरे के पीछे भी एक चेहरा छुपा हो

सावन और तुम

सावन बड़ा बेईमान सा है,

बिल्कुल तुम्हारी तरह

पता नहीं कब रूठ जाए 

बिल्कुल तुम्हारी तरह

कभी गरजता है, कभी बरसता 
तुम भी तो कुछ वैसी ही हो

हाँ बिल्कुल वैसी ही 

रिमझिम बरसो तो 

मन करे रुको ही नहीं

जरा सी तीव्र हो जाओ तो रुकती नहीं हो

पर मैं तब भी सबसे ज़्यादा प्रेम सावन से ही करता हूँ

हाँ बसन्त खूबसूरत है, ग्रीष्म ऋतु अलौकिक

हाँ पतझड़ में एक उदासीनता है और सर्दी की भी अपनी ही बात है

पर सावन खूबसूरत भी है तो   कुरूप भी 

कभी सीधा भी तो कभी चंचल भी

तुम भी वैसी ही हो , बिल्कुल वैसी ही…

“मेरे प्रिय नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी हैं”

There are very few memories of childhood that remain etched in one’s heart . One such memory is me writing the above sentence on notebook along with this one

” Hamare Desh ke pradhanmantri Shri Atal Bihari Vajpayee Hain

When I started viewing things around me , Atal Ji was the Prime Minister. I was just four-five years old. I was always amazed by the oration style of this man. It was not that tough to understand him. He was people’s leader. I was always in awe of this man. One paper came on his birthday, his collection of poems. “Kaal ke Kapal par”  and few others to name so. It was fascinating to read him.

I always consider him my favourite leader, respect comes naturally. Today the news of his death was shattering. I knew this was coming as his health was not that good. He left politics in 2006 but there was always the feeling of him being around the Indian politics and he always remained relevant and will forever be.

When the news of his health flashed on the screen, prayers for his health from every part of India. This speaks volume about Vajpayee Ji. I always idolized him and there isn’t any leader like him today with acceptability from every section despite the ideology. India has lost its greatest leaders of independent India. He created a void which won’t be filled forever.

You’ll be remembered till eternity, Sir.

वो दिन

शायद वो दिन कुछ खास था

तुम्हारे लिये नहीं पर हाँ मेरे लिए

तुमने शायद मज़ाक किया हो

पर मैंने सच मान लिया उसे

तुम शायद कह कर चली गयी

पर मैं वहीं ठहर गया

रुक सा गया कुछ मैं

बारिश ही का समय था

सिर्फ़ मैं नहीं भीग रहा था अंदर भी कुछ था जो पानी में बह रहा था

वो आस जो मैंने तुमसे लगाई थी

अच्छा ही हुआ कि वो बह गया

वरना मैं वहीं रुका हुआ होता

तुम्हें न सोचकर भी सोचता रहता

वह बारिश कुछ ख़ास थी

वो दिन कुछ खास था

Yy7

Do relationships come with a purpose? Do we make friends for our advantage? Is there anything called being selfless?

She sent me a message that read ” Come to our productions when you need help”. Last time she sent me the message was 4 months back for some professional purpose only.

You don’t remember that person, you were friends with me just because we used to meet regularly and we thought we were friends. There used to be a time when she used to be the first one to wish me, now she doesn’t even remember my birthday. The last time we met was 2 years ago. Before that, 3 years ago . 2 times in 5 years and we live in the same town. It’s okay to move on with life but move on with the motive of not coming back because when you come back, you come with those old memories and then they haunt you, bring up many unsaid things

Pain of The mother 

O Ganga Ma,

They say they have come a long way to see you. To worship you, to take bath and dissolve all sins within you, they have come a long way. I wish it was true, which wasn’t. I tried stopping a few of them, tried asking them not to use soap while bathing or washing clothes. They saw me and just ignored me and continued what they were doing. I wonder how will they feel if someone will defecate near their house because they don’t feel ashamed of doing this. Despite public toilet being few metres away they enjoy defecating in public.  The open “naalas” which continuously bring all sewage and waste to the poor river. I don’t understand how long we’ll ignore this thing. We are in our own La La Land that holy Ganga will purify everything no matter how much dirt we throw in the river. Who are we fooling? It is even more unfortunate that foreigners respect feelings towards rivers and they understand the pain of Ganga more than the locals. We live here but we worship Ganga only for show off. We don’t really respect her. We are disappointing both of our mothers.

I’m not putting the painful photo of Ma Ganga on this Ganga-Dussehra because mothers always smile even through pain and hardships …

माँ

#MothersDay #Mom

तुम्हारे लिये मैं क्या लिखूँ

जब से आँख खुली, ख़ुद को तुम्हारे आँचल में पाया

जब भी मैं गिरा, तुमने मुझे संभाला

पता है मैं बहुत कुछ बोल देता हूँ कई बार

एहसास हो जाता है पर माफ़ी मांगने से हिचकिचा जाता हूँ

तुम तब भी समझ जाती हो और बिन कहे ही सब सुन लेती हो

कहीं निकलता हूँ तो तुम हर पांच मिनट में फ़ोन करती हो,

खीज भी जाता हूँ कभी कभी माँ का दिल जो नहीं समझता मैं।

तुम डांट भी लगाती हो तो प्यार भी करती हो

शायद इतना सब मैं अब भी सामने न कह पाऊं,

पर तुम माँ हो, तुम सब जानती हो ।

एहसास

बचपन में पढ़ाई से भागते थे सुकून की तलाश में,

सोचते थे कि जब बड़े होंगे तो आज़ाद होंगे,

होमवर्क से आज़ाद, माँ की डांट , पापा की मार से आज़ाद..

नहीं झेलना होगा ये सब और सपने करेंगे सच अपने

मानो बड़ा होने पर पंख लग जाएंगे

बड़े हुए तो एहसास हुआ कि शायद सुकून तो हम

पीछे छोड़ आये थे,

उस बेफ़िक्री में, उस बचपन में… ।

दिल रोता है…

#humanity

आज कुछ अजीब सी सिहरन है।

मैं बेटा हूँ पर सिहर सा जाता हूँ बस मंज़र को सोचकर ही,

उसने तो वो सहा होगा फिर उस मंज़र को, चीखी होगी चिल्लाई होगी ।

क्या इतनी सी भी रूह नहीं काँपी उन दरिंदो की?

आज आक्रोश है, पर यह आक्रोश यह ज्वार तो पाँच साल पहले भी था

यह तो 2000 साल पहले भी था।

फिर क्यों , फिर क्यों हर रोज़ कहीं न कहीं अखबार में वही ख़बर,

वही मंज़र !

बस नाम बदल जाते हैं, जगह बदल जाती है,

हैवानियत नहीं बदलती।

इंसानियत हार रही है, यह देखकर दिल रोता है।